मे तो समय का मुसाफिर हु.
उसके हसने – रुलाने वाले स्वभाव से वाकिफ हु.
मे तो समय का मुसाफिर हु.
कभी गिरता हु,
तो कभी उठता हु.
कभी बिछड़ता हु,
तो कभी मिलता हु.
कभी खो जाता हु,
तो कभी सही हो जाता हु.
कभी डर जाता हु,
तो कभी भीड़ जाता हु.
कभी सहेमासा जाता हु,
तो कभी खुल जाता हु.
कभी बेवक़ूफ़ बन जाता हु,
तो कभी समझदार हो जाता हु.
कभी घुसे से बर्ताव करता हु,
तो कभी हौले से सुनलेता हु.
कभी बया कर देता हु,
तो कभी छुपा देता हु.
कभी खुदगर्ज़ बन जाता हु,
तो कभी सेवा भावी बन जाता हु.
कभी देश भक्त बन जाता हु,
तो कभी इंसानियत मानता हु.
कभी खुदा से दुआ मांगता हु,
तो कभी उसके वजूद की निसानी मांगता हु.
कभी माता – पिता के अरमानो को देख कर चलता हु,
तो कभी खुदकी मन मर्ज़ी करता हु.
मे तो समय का मुसाफिर हु.
आज ज़िन्दगी, तो कल मौत.
उसके इस मज़ाक़ से वाकिफ हु.
मे तो समय का मुसाफिर हु.